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हिमाचल प्रदेश में वैज्ञानिक ढंग से बीज आलू उत्पादन

Posted by my BigHaat on

आलू भारत की एक महत्वपूर्ण फ़सल है। उत्पादन की दृष्टि से इसका स्थान हमारे देश में चावल एवं गेहूं के बाद तीसरा है। हाल के कुछ वर्षो में दुनियाँ में बढ़ती जनसंख्या एवं खाद्यान की कमी को देखते हुए आलू को खाद्य सुरक्षा फ़सल के एक महत्वपूर्ण विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।

हिमाचल प्रदेश में आलू एक नकदी फ़सल के रूप में उगाई जाती है। आलू उत्पादन में इसके बीज का खास महत्व है। कहा जाता है कि यदि आलू का बीज उत्तम गुणवत्तायुक्त हो तो फ़सल उत्पादन की आधी समस्या दूर हो जाती है। भारत के कुल बीज आलू उत्पादन का 94% हिस्सा मैदानी क्षेत्रों एवं 6% पहाड़ी क्षेत्रों से आता है। हिमाचल की जलवायु स्वस्थ बीज आलू उत्पादन के लिए उपयुक्त है। आज भी हिमाचल प्रदेश, देश के कई पर्वतीय राज्यों जैसे जम्मू कश्मीर,उतराखण्ड तथा उत्तरपूर्वी राज्यों को बीज आलू की आपूर्ति करता है। लेकिन प्रदेश में आलू की उपज देश के अन्य राज्यो के मुक़ाबले काफी कम है। किसानों को स्वस्थ बीज आलू उपलब्ध न होना एवं कीटनाशकों का प्रयोग उचित मात्रा व समय पर न करना कम उपज के मुख्य कारण है। अतः किसानो को इन चीज़ों की जानकारी होना बहुत ज़रूरी है। हिमाचल प्रदेश में स्वस्थ बीज आलू उत्पादन के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए।

अनुमोदित किस्में: कुफरी ज्योति, कुफरी चन्द्रमुखी, कुफरी गिरिराज़, कुफरी हिमालिनी, कुफरी शैलजा, कुफरी गिरधारी एवं कुफरी हिमसोना।

उपयुक्त क्षेत्र: हिमाचल के 7000 फीट से ज़्यादा ऊंचाई वाले क्षेत्र बीज आलू के लिए उपयुक्त हैं। इन क्षेत्रों में साधारण खुरण्ड, भूरा गलन, जड़ ग्रंथ कृमि इत्यादि समस्याएँ खेतों में नहीं होती। साथ ही साथ इन क्षेत्रों में वायरस फैलाने वाले माहू कीट का प्रकोप भी कम होता है। अतः इन क्षेत्रों में स्वस्थ बीज आलू उत्पादन की पर्याप्त संभावनाएं हैं। अन्य पहाड़ी क्षेत्रों में फफूंदनाशक की सहायता से बीज आलू की फसल की जा सकती है।

बीज का स्त्रोत:  हमेशा किसी विश्वसनीय स्त्रोत से प्राप्त बीज का ही प्रयोग करें। इसके लिए बेहतर है कि सरकारी बीज उत्पादन एजेंसी, राष्ट्रीय बीज निगम, राज्य फार्म निगमों से खरीदे गए बीज आलू का ही इस्तेमाल करें और हर 3 साल बाद प्रमाणित बीज बदल दे।

खेत की तैयारी: बीज आलू हेतु ऐसे खेत का चयन करना चाहिए जिसमें पिछले वर्ष आलू न ली गयी हो। बलुई दोमट मिट्टी जिसका पी. एच. 6-7 के बीच हो, बीज आलू के लिए उपयुक्त होती है। पहाड़ी क्षेत्रों में खेत ढलानदार होते हैं। अतः खेतों की जुताई ढलान के विपरीत दिशा में करनी चाहिए। ऐसे क्षेत्रों में बर्फ गिरने से पहले अक्तूबर-नवम्बर में खेत तैयार कर लें। खेत को 20-25 सेंटीमीटर गहरी जुताई कर इसे खाली छोड़ देते हैं ताकि यह पर्याप्त मात्रा में पानी सोख ले। गोबर की खाद फरवरी मार्च में डाली जाती है। बर्फ पिघलने के बाद खेत को जोत कर और सुहागा चलाकर समतल कर दिया जाता है।

बीजाई का समय: आलू की बीजाई हिमाचल के ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में अप्रैल के महीने में की जाती है जिससे फसल अंतिम अगस्त तक तैयार हो सके। बुआई के समय को इस प्रकार चुनें ताकि वायरस फैलाने वाले माहू कीट से बचा जा सके।

बीजाई: बीजाई से 10 दिन पहले आलू कन्दों को हल्के प्रकाश वाले छायादार स्थान पर फैला दें ताकि उसमें अंकुरण हो सके। लगभग 35-50 ग्राम वजन की एवं 1-2 सेंटीमीटर लंबी हरी अंकुरण वाली स्वस्थ एवं साबुत बीज का ही इस्तेमाल करें। अंकुरित कन्दों में से पतले पीले एवं रोगी कन्दों को बाहर निकाल दें। मेंड़ों पर 5-7 सेंटीमीटर गहरा गड्ढा खोद कर उसमें बीज आलू रख दें तथा मिट्टी से ढक दें। क्यारियों के बीच की दूरी 60 सेंटीमीटर एवं कन्दों के बीच की दूरी 20 सेंटीमीटर रखनी चाहिए। साधारणतया आलू का बीज दर 20-25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होता है। पौधे के एक समान निर्गमन सुनिश्चित करने के लिए ढलान के ऊपरी तरफ बड़े कन्द तथा निचली तरफ छोटे कन्द लगाने चाहिए क्योंकि ढलान के ऊपरी तरफ मिट्टी उथली होने से नमी कम होती है और छोटे कन्द देर से उगते हैं। 

खाद एवं उर्वरक: बर्फ गिरने के बाद खेत तैयार करते समयअच्छी तरह से सड़ी गली गोबर कि खाद 15-30 टन / हेक्टेयर कि दर से नालियों में डाले। 30 टन/ हे. खाद प्रयोग करने से आवश्यक फास्फोरस और पोटाश की मात्रा की भरपाई हो जाती है। यदि 15 टन/ हे. गोबर की खाद डाली गई हो तो आवश्यक फास्फोरस और पोटाश की आधी मात्रा का ही प्रयोग करें।  

खेतों में बीजाई के समय प्रति हेक्टेयर की दर से 80 कि.ग्रा.नाइट्रोजन (3.2 क्विंटल कैन), 100 कि.ग्रा. फास्फोरस (6.25 क्विंटल सिंगल सुपर फास्फेट) और 100 कि.ग्रा. पोटाश (1.7 क्विंटल म्यूरेट ऑफ पोटाश) तथा मिट्टी चढ़ाते समय 40 कि. ग्रा.नाइट्रोजन (1.6 क्विंटल कैन) डालने कि सिफ़ारिश कि जाती है। इन उर्वरकों को नालियों में डालने के बाद उन्हें मिट्टी से ढक दें और उसके बाद बीज कन्दों को लगाएँ ताकि बीज उर्वरकों के सीधे संपर्क में न आने पाएँ।

सिंचाई: पहाड़ी क्षेत्रों में आलू की फसल वर्षापर निर्भर होती है। जहां भी पानी उपलब्ध हो बीजाई से पहले एक सिंचाई पौधों के समान बढ़वार के लिए ज़रूरी होता है। मिट्टी की नमी देखते हुए 8-10 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करते रहें। खेत में पानी इतना दे जिससे मेंड़ों का दो तिहाई भाग डूब जाए।  कंदीकरण व मिट्टी चढ़ाने के समय सिंचाई बहुत ज़रूरी है। खुदाई से 10-12 दिन पहले सिंचाई बंद कर दें।

कृषि क्रियाएँ: खेतों में खरपतवार नियंत्रण हेतु शाकनाशी जैसे कि मेट्रीब्यूजीन अथवा सेनकॉर को 1 मिलीलीटर/लीटर पानी में घोलकर बीजाई के 3-4 दिनों के अंदर फसल पर छिड़काव करें। कन्दों की बीजाई के बाद मेंड़ों को चीड़ की पत्तियों या धान के पुआल से ढक दें ताकि मिट्टी की नमी बनी रहे। बीजाई तथा इसके 40-50 दिन के भीतर मिट्टी चढ़ाने एवं निराई- गुड़ाई का काम पूरा कर लें। फ़सल अवधि के दौरान तीन बार क्रमशः 45, 60 एवं 75 दिनों के उपरांत फ़सल की जांच करना आवश्यक है। जांच के दौरान मोजाइक, तना गलन, वीनल नेक्रोसिस, पत्ती मोड़क वायरस इत्यादि रोगों के लक्षण वाले पौधों को उखाड़ कर नष्ट कर दें।

पौध संरक्षण: पहाड़ी क्षेत्रों में पिछेता झुलसा तथा अगेता झुलसा जैसे फफूंद रोग आलू की फ़सल को भारी नुकसान पहुंचाते हैं। इस पर नियंत्रण पाने हेतु मानसून शुरू होने पर मेंकोजेब या प्रोपीनेब 0.2% (2 ग्राम/लीटर पानी) का छिड़काव करें। आवश्यकता पड़ने पर 10 दिनों के अंतराल पर 2-3 छिड़काव और करें।

पहाड़ी क्षेत्रों में सफ़ेद सूँडी, कर्तक कीट तथा पत्ती भक्षक कीट आलू फ़सल को नुकसान पहुंचाते हैं। मिट्टी चढ़ाते समय खेत में फोरेट 10G या कार्बोफ्यूरोन 3G की 2.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग कर सफ़ेद सूँडी पर नियंत्रण पाया जा सकता है। कर्तक कीट की रोकथाम के लिए प्रति हेक्टेयर क्लोरोपाइरिफ़ोस 20EC की 2.5 लीटर मात्रा 1000 लीटर पानी में घोलकर मेंड़ों पर छिड़काव करें। पत्ती भक्षक कीट को नियंत्रण करने के लिए कार्बेराइल 50% WP 2 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के दर से छिड़काव करें। माहुं बीज आलू की फ़सल में विषाणु वाहक का कार्य करता है। इस पर नियंत्रण हेतु इमिडाक्लोप्रिड 0.03% (3 मिलीलीटर/10 लीटर पानी) का छिड़काव पौधा निकलने के बाद करें।

फ़सल की खुदाई तथा भंडारण: विषाणुमुक्त बीज आलू उत्पादन हेतु माहुं की संख्या इसके क्रांतिक स्तर (20 माहुं/100 पत्तियाँ) तक पहुँचने से पहले अगस्त के तीसरे सप्ताह तकफ़सल के डंठल काट दें। इससे माहुं कीट की बढ़वार रुक जाती है तथा कन्दों का छिलका भी पक जाता हैं। डंठल काटने के 15-20 दिनों के बाद छिलका सख्त होने पर फ़सल की खुदाई कर लें एवं 10 दिनों के लिए छायादार स्थान पर ढेर बना कर रख दें। जिन आलुओं को बीज के लिए रखना हो उन्हें पानी में धोकर  3% बोरिक एसिड के घोल में 25-30 मिनट तक बीजोपचार करें। इस घोल को 20 बार तक प्रयोग किया जा सकता है। उपचरित आलुओं को सुखाकर आवश्यकतानुसार बड़े, मध्यम एवं छोटे आकार में वर्गीकृत कर लें तथा बोरियों में भंडारण करें।

 

 By Dhiraj Kumar Singh

With Thanks, Source 


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