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कीट और रोग प्रबंधन में सूक्ष्म जीवों (जैव-एजेंट) का महत्व

Posted by BigHaat Agronomy Team on

फसल में कीटों और रोगों का नियंत्रण आमतौर पर रासायनिक कीटनाशी  का उपयोग करके किया जाता है। इन रासायनिक कीटनाशकों के लंबे समय तक उपयोग ने कई समस्याओं को जन्म दिया है जैसे कि विभिन्न रसायनों के लिए कीटों के प्रतिरोध में वृद्धि, मृदा प्रदूषण पैदा करना और मानव उपभपग के लिए ऐसे फसल हानिकारक होते है| 

रासायनिक कीटनाशकों के विकल्प में जैविक खाद और जैव कीटनाशकों का उपयोग करके कीटों और रोगों के जैविक प्रबंधन किया जा सकता है। साथ ही, यह सबसे फायदेमंद तकनीक और लागत प्रभावी भी है। 

कीटों और रोगों के जैविक नियंत्रण के लिए विभिन्न प्रकार के जीवो  का उपयोग किया जाता है, जीवाणु, कवक, वायरस और निमेटोड जैसे जिव , जैविक नियंत्रण में प्रमुख भूमिका निभाते है | 

जैव कीटनाशकों के उपयोग के लाभ

  1. फसल की पैदावार को प्रभावित किए बिना रासायनिक कीटनाशकों के उपयोग को कम करता है

  1. बहुत कम मात्रा में प्रभावी और जल्दी से मिस्तरित भी होता है| 

 

  1. अन्य जैव कीटनाशकों के साथ उपयोग करने से किट या रोग प्रबंधन में ज्यादा कार्यकर होता है 

  1. अंत में, जैव कीटनाशकों के उपयोग से प्राकृतिक कृषि उत्पाद प्राप्त होते हैं |

  1. कीटों का जैविक नियंत्रण

जैव-एजेंट जैसे जीवाणु-कवक, वायरस (NPV), आदि का व्यापक रूप से कृषि में विभिन्न कीटों के नियंत्रण के लिए उपयोग किया जाता है। बैक्टीरियल और फंगल बायो-एजेंट को 1 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करना चाहिए।
नोट: बैसिलस थुरिंजिनेसिस रेशम कीटों को मार देगा, इसलिए इसका उपयोग रेशम उत्पादन के सामुदायिक क्षेत्रों में नहीं किया जाना चाहिए।

 

 

NPV वायरस  मुख्य रूप से कीटों के जैविक वायरस के लिए मुख्य रूप से पतंगों और तितलियों को नियंत्रित करने के लिए उपयोग किया जाता है। NPV  का व्यापक रूप से कपास (बोल वर्म), दलहन (फली छेदक), मिर्च और शिमला मिर्च (फल छेदक) आदि में स्पोडोप्टेरा लिटुरा और हेलिकोवरपा आर्मिजेरा को नियंत्रित करने के लिए उपयोग किया जाता है।

 

कपास में NPV @ 200 LE प्रति एकड़ का छिड़काव करना चाहिए। अन्य फसलों जैसे दलहन, सब्जियों में NPV @ 100 LE प्रति एकड़ का छिड़काव करना चाहिए।

 

 2. रोगों का जैविक नियंत्रण

जीवाणु (बैसिलस सबटिलिस, स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस), कवक (ट्राइकोडर्मा स्प., पेसिलोमाइसेस लिलान्सिनस, पोकोनिया क्लैमाइडोस्पोरिया, आदि) जैसे जैव-एजेंटों का उपयोग विभिन्न मिट्टी और बीज जनित कवक और जीवाणु रोगों के साथ-साथ निमेटोड को नियंत्रित करने के लिए व्यावसायिक रूप से उगाई जाने वाली कृषि और बागवानी में किया जाता है।

 

जैव-एजेंटों का उपयोग विभिन्न तरीकों से किया जा सकता है जैसे कि बीज उपचार, अंकुर जड़ उपचार, पर्ण स्प्रे या रोपण के समय मिट्टी का अनुप्रयोग से। ये बायो-एजेंट मिट्टी में मौजूद रोगजनकों के साथ-साथ प्रभावित बीजों को भी मार देते हैं जिनमें जड़ गलन, पौधा पट्टा सड़न, झुलसा रोग आदि मौजूद होता है। 

 

इस प्रकार, जिव -एजेंट फसल के कीटों और रोगों के नियंत्रण में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।यह पौधों के स्वास्थ्य और फसल उत्पादकता को बनाए रखते हैं। इस प्रकार, मृदा सूक्ष्म जीवों को प्रभावित करने वाली कृषि प्रथाओं को टाला जाना चाहिए एवं कीटों और रोगों के नियंत्रण के लिए जैव-एजेंटों का उपयोग , जैव उर्वरकों को शामिल करना चाहिए जो मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाता है, जिससे लीचिंग (घुल कर बह जाना) कम होती है, और पर्यावरण प्रदूषण को कम करता है।

पर्यावरण के अनुकूल होने के कारण, लाभकारी रोगाणु कीटों और रोगों के नियंत्रण के साथ-साथ मिट्टी की उर्वरता में सुधार के लिए आईपीएम(IPM) सिस्टम के आदर्श घटक हैं

 

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डॉ. आशा, क.म.,
बिगहाट

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